मिन्हाज़ भारती – जीवन परिचय (Bio Draft – Part 1)
मिन्हाज़ भारती का जन्म बिहार के खगड़िया ज़िले के एक छोटे से गाँव बोरना में 1980 के दशक में हुआ। उनका बचपन सीमित संसाधनों और आर्थिक कठिनाइयों के बीच बीता। प्रारंभिक शिक्षा के कुछ वर्ष उन्होंने मधेपुरा में प्राप्त की।
परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत चुनौतीपूर्ण थी। बच्चों के भविष्य और बेहतर शिक्षा के उद्देश्य से उनके पिता रोज़गार की तलाश में दिल्ली चले गए। आजीविका के लिए उन्होंने वहाँ दर्जी (टेलर) का कार्य शुरू किया। यद्यपि वे परिस्थितियों के कारण यह कार्य कर रहे थे, परंतु उनके भीतर शिक्षा के प्रति गहरी प्रतिबद्धता थी—वे अपने समय में पटना विश्वविद्यालय से B.Sc. स्नातक रह चुके थे।
दिल्ली में दर्जी का काम करते हुए ही उनकी शैक्षणिक योग्यता और रुचि के कारण उन्हें प्राइवेट होम ट्यूशन के अवसर मिलने लगे। इन ट्यूशन कार्यों से उन्हें न केवल आत्मसम्मान मिला, बल्कि परिवार को आगे बढ़ाने और बच्चों को अच्छी शिक्षा देने का मार्ग भी प्रशस्त हुआ।
इन्हीं प्रयासों के परिणामस्वरूप मिन्हाज़ भारती को दिल्ली के CBSE बोर्ड स्कूल में दाख़िला मिला। उनकी स्कूली शिक्षा प्रारंभ से लेकर बोर्ड परीक्षा तक CBSE प्रणाली में ही संपन्न हुई।
उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने जामिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से भौतिकी (Physics) में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने विभिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) में कार्य करते हुए केरल की यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिकट से B.Tech की पढ़ाई पूरी की। इसके अतिरिक्त उन्होंने EIILM विश्वविद्यालय से PG Diploma किया और यूके (United Kingdom) से दो Inter-level courses भी सफलतापूर्वक पूरे किए।
पेशेवर जीवन के क्रम में उन्होंने लगभग दो वर्षों तक कुवैत में भी कार्य किया। यह आर्थिक रूप से स्थिर और सुरक्षित जीवन का दौर था। किंतु इसी समय भारत में घट रही सामाजिक और राजनीतिक घटनाओं ने उन्हें भीतर तक विचलित किया। इन परिस्थितियों से मंथित होकर उन्होंने 2019 में कुवैत की उच्च वेतन वाली नौकरी छोड़कर भारत लौटने का निर्णय लिया।
भारत वापसी के बाद कुछ समय तक उन्होंने दिल्ली में विभिन्न सामाजिक संगठनों (NGOs) के साथ मिलकर आम लोगों की समस्याओं पर काम किया। इसी दौरान उन्हें अपने मूल, अपने गाँव और ग्रामीण समाज की स्थिति का गहरा एहसास हुआ। उनके मन में यह प्रश्न बार-बार उठने लगा कि यदि महानगरों में लोग बुनियादी आवश्यकताओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति कितनी कठिन होगी।
यही सोच उन्हें अपने गाँव और अपने समाज की ओर लौटने के लिए भीतर से प्रेरित करने लगी।